झूठ कितना भी दमदार लगे किन्तु सच का मुकाबला कतई नहीं कर सकता…

झूठ कितना भी दमदार लगे किन्तु सच का मुकाबला कतई नहीं कर सकता…
दरअसल अधिकांश लोग प्रतिदिन झूठ बोलते हैं। हमें लगता है कि झूठ के जरिये ही हमारी जिंदगी चल रही है, लेकिन यह गलतफहमी है। परिस्थिति नहीं, हमारी आंतरिक कमजोरी हमें झूठ बोलने को उकसाती है। लोगों का कहना है कि वे झूठ इसलिए बोलते हैं, क्योंकि सच से मिलने वाली प्रतिक्रिया से उन्हें डर लगता है। उन्हें लगता है कि सच उनके लिए परेशानी खड़ी कर सकता है, जबकि होता इसके बिलकुल उलट है। एलेक्जेंडर पोप कहते भी हैं- ‘वह जो झूठ बोलता है, नहीं जानता कि उसे कितना बड़ा लक्ष्य पार करना है, इसके लिए उसे कम से कम 20 और झूठ बोलने होंगे।’

आज ऐसे शोधों की कमी नहीं है जिनका निष्कर्ष है कि झूठ की सत्ता को सार्वभौमिक मानने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है। मनोवैज्ञानिक डी पॉउलो का शोध बताता है कि औसतन हर व्यक्ति प्रतिदिन दो-तीन झूठ अवश्य बोलता है। इस झूठ में फ्रिज से मिठाई खाना किंतु न स्वीकारना या फिर ब्रश न करना किंतु हां कहना जैसे झूठ भी शामिल हैं। लेकिन आखिर कारण क्या है कि सच ईश्वर की सत्यापित व्यवस्था होने के बावजूद पीछे छूट जाता है। इसका जवाब दार्शनिक शॉपेनहार की बातों में काफी हद तक मिलता है। वे कहते हैं कि हर सच को तीन स्तरों से गुजरना होता है। पहले में उसका मजाक बनाया जाता है, दूसरे में उसे दबाने की कोशिश की जाती है और तीसरे में उसे स्वत: प्रमाण के तौर पर स्वीकारा जाता है। जाहिर है हम आम जीवन में पहले स्तर पर ही घबरा जाते हैं और झूठ का दामन थाम लेते हैं। वैसे कुछ झूठ सच के समान ही पवित्र होते हैं क्योंकि यह दूसरों की भलाई के लिये होते हैं। याद कीजिये कि आपने ऐसा झूठ कब बोला था? आपका जवाब यही होगा…

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