सोनपुर मेला में चंद्रगुप्त के जंगी हाथियों का लगता था मेला, अंग्रेजों से मुकाबले को कुंवर सिंह ने खरीदें अरबी घोड़े

मोक्षदायिनी गंगा और विष्णुगर्भा गंडकी के संगम सोनपुर में कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है, जिसे हरिहर क्षेत्र मेला भी कहा जाता है। गौरवशाली इतिहास एवं धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक विश्व प्रसिद्ध मेला लगातार एक माह तक चलता है। इस मेला में लोक संस्कृति और जनजीवन की जीती-जागती तस्वीरें प्रस्तुत होती है। भोजपुर, मिथिलांचल, बज्जिकांचल और मगध में इसे लोग छतर मेला कहते हैं।

इस मेला की विशेषता हैं इसका विश्वव्यापी स्वरूप। हरिहर क्षेत्र का स्थान भारतवर्ष में धर्मक्षेत्रों में काफी महत्वपूर्ण है। प्रतिवर्ष देश-विदेश के विभिन्न भागों से कोई 10 से 15 लाख पर्यटक और तीर्थयात्री इस मेला से शरीक होकर यहां के प्राचीन मठ-मंदिरों में अपनी भक्ति अर्पित करते हैं। सोनपुर का यह हरिहर क्षेत्र मेला देश के प्राचीनतम मेलों में से एक है। भिंडन विल्सन नामक एक अंग्रेज लेखक ने अपनी पुस्तक रोमिनी सेंस ऑफ बिहार में सोनपुर मेला का जिक्र पहले-पहल वर्ष 1846 में किया था। आमलोगों की लोकप्रियता तथा इसकी उपयोगिता को देखते हुए अंग्रेजों ने इस मेला को यातायात एवं मेला की व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार किये।

ब्रिटिश शासन के दौरान इस मेला की तड़क-भड़क अपनी चरम सीमा पर पहुंच गयी थी। वे भारतीय रइसों की नकल करते हुए, एक ओर हुक्का पीते, आनंद उठाते तो दूसरी ओर वे राजाओं, नवाबों के साथ लश्कर सहित तंबू-गाड़ते थे। एक ओर लोक कलाकारों का जमघट होता था और पौराणिक कथाओं पर आधारित लोक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता था तो दूसरी ओर तवायफों की महफिले सजती थीं। लेकिन बाद के वर्षों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का स्वरूप बदल गया। देखते -देखते थियेटर में अश्लील नृत्य प्रस्तुत हाेने लगे।

मेले का मुख्य आकर्षण मेला के दौरान मठ-मंदिरों के इस छोटे से नगर में साधुगाछी तीर्थयात्रियों के आकर्षण व श्रद्धा का मुख्य केंद्र होती है। सोनपुर के पुराने पुल से उतरने के बाद यहां पहुंचा जा सकता है। साधुगाछी में विभिन्न मतावलंबियों और अखाड़े के पंडाल लगते हैं। मेला का मुख्य बाजार मीना बाजार है, जिसमें देश के कोने-कोने से सभी तरह के चीजों की सैकड़ों दुकानें आकर लगती है। इस मेला का अन्य मुख्य आकर्षण का केंद्र होता है पशुओं और पंछी की खरीद-बिक्री। यहां पंजाब, हरियाणा, राजस्थान की अच्छी नस्ल के बैलों की जोड़ी, हाथी एवं उसके छोटे-छोटे बच्चों को देखकर लोग मेला का आनंद उठाते है। सबसे अनोखा बाजार गाय का होता है। पूरी दुनिया में जो आपको खोजने पर भी नहीं मिलती है वे यहां मिल जाती है।

इतिहास के पन्नों में ब्रिटिश लेखक मार्क सैंड की पुस्तक ट्रैवल आन माई एलीफैंट में इस मेला की चर्चा है। सैंड ने 1978 में हाथी पर बैठकर कोर्णाक से कोनहरा घाट तक की यात्रा की थी और मेला के हाथी बाजार में अपना शिविर डाला था। इस पुस्तक के अनुसार औरंगजेब के समय इस मेला में तातार और अरब देशों से लोग हाथी का व्यापार करने आते थे। मौर्य वंश के संस्थापक सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के समय यह जंगी हाथियों का सबसे बड़ा मेला था। कहा जाता है कि औरंगजेब के जेल से रिहा होने के बाद छत्रपति शिवाजी सबसे पहले यहां पधारे थे़ वहीं बाबू वीर कुंवर सिंह ने भी अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए उच्च नस्ल के लगभग एक हजार अरबी नस्ल घोड़े यहीं से खरीदे थे।

कैसे पहुंचें, कहां ठहरें : पटना से लगभग 25 किलो मीटर तथा वैशाली मुख्यालय हाजीपुर से 3 किलो मीटर दूर है। वहीं हाजीपुर बस स्टैंड से 5 किलोमीटर दूर है। मेला परिसर तक पहुंचने के लिए सबसे आसान रास्ता सड़क मार्ग है। निकटवर्ती रेलवे स्टेशन है सोनपुर। कहां ठहरे : जहां तक ठहरने का सवाल है तो हाजीपुर शहर में हर बजट का होटल है। इसके अलावा मेला के दौरान बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम द्वारा कॉटेज का निर्माण कराया जाता है। जहां हर सुविधा उपलब्ध होता है।

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