अगर आप सोशल मीडिया पर थोड़े से भी ऐक्टिव हैं, तो आपको 43,000 करोड़ रुपये की कीमत मालूम होगी. कहा जा रहा है कि ये 43,000 करोड़ रुपये वो पैसे हैं, जो यूपीए की सरकार ने ईरान को पेट्रोल खरीदने के बदले नहीं चुकाए हैं.

अगर आप सोशल मीडिया पर थोड़े से भी ऐक्टिव हैं,
तो आपको 43,000 करोड़ रुपये की कीमत मालूम होगी.
कहा जा रहा है कि ये 43,000 करोड़ रुपये वो पैसे हैं,
जो यूपीए की सरकार ने ईरान को पेट्रोल खरीदने के बदले नहीं चुकाए हैं.
अब मोदी सरकार ने ये पैसे चुका दिए हैं और इसी वजह से भारत में पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं.

भारत ने ईरान का कर्ज चुका दिया है और इसकी वजह से कुछ लोगों को बेहद ही गर्व का अनुभव हो रहा है.
वो इस बात पर गर्व कर रहे हैं कि उन्होंने महंगा पेट्रोल खरीदकर देश की इतनी सेवा की है, जितनी आजतक किसी ने नहीं की थी.
लेकिन थोड़ा रुकिए, ठहरिए और याद करने की कोशिश करिए.
अपने देश को नहीं, ईरान को.
क्या हुआ था उसके साथ, क्यों आई थी ऐसी नौबत और क्या सच में भारत पर 43,000 करोड़ रुपये का कर्ज था.

भारत अपने तेल की ज़रूरतें पूरी करने के लिए सबसे ज्यादा सऊदी अरब पर निर्भर है.
इसके बाद सबसे ज्यादा तेल ईरान और फिर ईराक से आता था.
ये क्रम 2011 तक चलता रहा.
2011 में अमेरिका और अन्य ताकतवर देशों ने ईरान पर प्रतिबंध लगा दिया.
ईरान 2006 से ही अपने लिए परमाणु हथियार बना रहा था.
इसकी वजह से अमेरिका और दूसरे बड़े देश नाराज हो गए और उन्होंने 2011 में ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए.
इसका नतीजा ये हुआ कि ईरान भारत को जो हर रोज 4,00000 बैरल तेल भेजता था, वो घटकर 1,00000 बैरल प्रति दिन पर आ गया.
भारत ईरान से खरीदे गए तेल का 55 फीसदी पैसा तुर्की के हल्कबैंक के जरिए पेमेंट करता था.
वहीं बाकी बची 45 फीसदी रकम भारत यूको बैंक के जरिए रुपये में ईरान को देता था.
2013 में अमेरिका ने ईरान पर और भी प्रतिबंध लगा दिए, जिसकी वजह से ईरान हल्कबैंक के जरिए भारत से पैसे नहीं ले पाया.
नतीजा ये हुआ कि भारत की कंपनियों पर ईरान का कुल 6.4 बिलियन डॉलर (अगर एक डॉलर की कीमत 66 रुपये माने तो कुल करीब 43,000 करोड़ रुपये) बकाया हो गए.

इस बकाए में भारत की तेल कंपनी मंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड को 500 मिलियन डॉलर (करीब 3,326.38 करोड़ रुपये) निजी कंपनी एस्सार ऑयल को 500 मिलियन डॉलर (करीब 3,326.38 करोड़ रुपये) और इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन को करीब 1663.18 करोड़ रुपये देने थे.
इसके अलावा हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन को 642 करोड़ और एचपीसीएल मित्तल एनर्जी को 200 करोड़ के अलावा और दूसरी कंपनियों का भी ईरान पर बकाया था.
ये प्रतिबंध 14 जुलाई 2015 तक चलता रहा.
इसके बाद ईरान पर से कुछ प्रतिबंध हटा लिए गए.
लेकिन हल्कबैंक के जरिए पेमेंट लेने पर रोक बरकरार रही.
इसकी वजह से भारत की कंपनियां ईरान को पैसे नहीं चुका पाईं.
वहीं हर रोज करीब 1 लाख बैरल तेल उन्होंने खरीदना जारी रखा.

इसके बाद आया 2016, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरान गए.
वहां उन्होंने ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी से मुलाकात की और कई समझौतों पर दस्तखत किए.
वहीं भारत में रिजर्व बैंक भी इस कोशिश में लगा था कि किसी तरह से भारत की तेल कंपनियां ईरान को अपना बकाया चुका दें.
इस दौरान ईरान ने प्रतिबंध हटने के बाद से नियमों में बदलाव कर दिया.
पहले तो ईरान भारत को दिए जाने वाले तेल पर आधा ही किराया लेता था, लेकिन उसने पूरा किराया लेना शुरू कर दिया.
इसके बाद ईरान जो 45 फीसदी तेल की रकम रुपये में लेता था और बाकी पैसे हल्कबैंक के जरिए लेता था, उसे भी खत्म कर दिया.
नतीजा ये हुआ कि भारत को पैसे चुकाने के लिए अब नए रास्ते खोजने थे.
ईरान एक तो अपने बकाए पर ब्याज चाहता था और दूसरा वो चाहता था कि उसे पैसे का भुगतान यूरो में किया जाए.
इसके लिए आगे आया रिजर्व बैंक.
उसने यूको बैंक के जरिए ईरान को भुगतान करने का प्रस्ताव दिया.
2016 में जब पीएम मोदी ईरान के दौरे पर गए, तो उस वक्त बकाए की करीब 5000 करोड़ रुपये की किश्त चुका दी गई और धीरे-धीरे छह किश्तों में भारत ने ईरान के 43,000 करोड़ रुपये का कर्ज चुका दिया.

रिजर्व बैंक ने हल्कबैंक और यूरोपियन यूनियन के जरिए पैसे का भुगतान कर दिया है.

अब बात उस मैसेज की, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.
इसमें कहा गया है कि पीएम मोदी ने देश का कर्ज चुकाया है, जो पूरी तरह से #गलत है.
भारत की तेल कंपनियों ने ईरान से तेल खरीदा और उसे भारत में बेचा.
जब इन तेल कंपनियों ने भारत में लोगों को तेल बेचा, तो लोगों से उसका पैसा लिया.
कंपनियों ने लोगों से तो पैसे ले लिए, लेकिन वो पैसे ईरान तक नहीं पहुंच पाए.
इसका सीधा सा मतलब ये है कि लोगों से लिए गए पैसे कंपनियों के पास थे, जो वो ईरान को नहीं दे पा रहे थे.
इसमें देश के #बकाए जैसी कोई बात नहीं थी, क्योंकि पैसा सरकार के ऊपर नहीं, कंपनियों के ऊपर बकाया था और ये वो पैसा था,
जो कंपनियां लोगों से वसूल चुकी थीं और ईरान को नहीं दे पा रही थीं.