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सिवान के चंद्रशेखर के हत्यारों की उम्र कैद की सजा बहाल रहेगी

सिवान : दिल्ली से एक लड़का आया कौशल्या का बेटा राम तो नहीं लेकिन राम जैसा ही था वो चंद्रशेखर रामराज की बातें करता लोगों को समझाता कि जिंदा कौमें दरबों में नहीं दुबकतीं बल्कि प्रतिरोध करती हैं।
सुगबुगाहट होने लगी थी लोग साथ आने लगे थे।
लेकिन सुपर सरकार को बुरा लगा और कौशल्या के राम चंद्रशेखर की हत्या हो गई और जागता हुआ सिवान चिरनिद्रा में सो गया।

हत्याएं तो रोज होती थीं लेकिन चंद्रशेखर की हत्या से पुरा सिवान सिहर सा गया था।
लोग जिंदा रहने के लिये पलायन करने लगे और दुआओं में प्रार्थना करते कि हमारे राजेन्द्र और मजहरुल को फिर से लौटा दो ईश्वर।
लेकिन ईश्वर ने नहीं सुनी सिवान अपना भगवान बदल चुका था।
सभी घरों की दीवारों पर राजेन्द्र और मजहरुल धूल फांक रहे थे और चमचमाते शीशे के पीछे से सुपर सरकार के साहेब मुस्कुरा रहे थे।
जालियांवाला बाग हत्याकांड को जरा आप याद कीजिये।
लोगों को पानी पिला रहे छोटे बच्चे उधम सिंह को याद कीजिये।
मौत का खेल देखनेवाली उन आंखों की दहशत के बारे में सोचिये और सिर्फ कल्पना कीजिये कि 20 सालों तक कैसे उधम सिंह ने उस भयावह मंजर को अपने सीने में जिंदा रखा होगा।
कितनी ज्वाला दबी रही होगी उसके सीने में।
और ये ज्वाला उस दिन शांत हुई जिस दिन उधम की गोलियों से निकलकर डायर के जिगर को पार कर गई थी।
प्रथम विश्व युद्ध को याद कीजिये युद्ध के बाद की संधि को याद कीजिये 1919 वाली वर्साय की संधि।
दबंगो ने सारा दोष पराजितों पर मढ़ दिया उनके उपनिवेश छीन लिए उनकी जहाजें छीन ली।
आर्थिक और सामरिक रूप से विकलांग बनाकर छोड़ दिया।
यहीं नही रुके हर साल एक निश्चित रकम देने को विवश किया गया।
इस घटना के बारे में सोच सोचकर वर्साय से कोसों दूर हिटलर आंसू बहा रहा था‌ और 15 सालों के बाद उसे मौका मिला।
लोगों ने जर्मनी का चांसलर बनाया सारे संधि पत्र जला दिए गये एक मार दिया गया और राष्ट्र फिर से खड़ा हो गया।
अत्याचारी सत्ता कितनी भी ताकतवर हो एक दिन ध्वस्त जरुर होती है।
सिवान में भी हुई निजाम बदला निजाम का स्वरूप बदला लोग मुखर हुए और सुपर सरकार का भौकाल तार-तार हुआ। सरकार की संस्थाएं भी मजबूत हुईं और भागे हुए लोग फिर से अपने सिवान लौटने लगे।
10 सालों में बिहार बदला है और सिवान भी बदला है अब लोग घरों से बाहर निकलने लगे हैं वो भी बिना डर के।
यहां की सड़कें अच्छी हो गयी हैं और बिजली मिल रही है साथ में शौचालय भी बनने लगे हैं।
पानी की टंकियां लगने लगी हैं और 20 साल के बाद ही सही कौशल्या और चंदा बाबू जैसे हम भारत के लोगों को न्याय मिलने की आस जगने लगी है।
दुनिया भी बदली है जालियांवाला बाग हत्याकांड के दोषियों के उत्तराधिकारियों ने खेद जताया है।
वर्षाय की संधि के लुटेरों ने यह मान लिया है कि अगर ये अपमानजनक संधि नहीं होती तो द्वितीय विश्व युद्ध कभी नहीं होता।
आश्चर्य है कि दशकों तक सिवान को आतंक और दहशत का पर्याय बना देनेवाले सुपर सरकार के साहेबों ने अपनी दहशतगर्दी और अराजकता के लिए खेद तक व्यक्त नहीं किया है आजतक।
लोकतंत्र की वाहवाही इसी में है कि किसी चंदा बाबू की उम्मीद न टूटे और कोई कौशल्या यह न मान बैठे कि उसके राम को इंसाफ अब नहीं मिलेगा।
सिर्फ दुआ कीजिये कि यह उम्मीद जिंदा रहे क्योंकि जिंदा रहने के लिये उम्मीद की खुराक भी अमृत से कम नहीं है।

-: राजीव रंजन कुमार-:

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