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डॉक्टरों को धरती का भगवान यूं ही नहीं कहा जाता

राजीव रंजन कुमार / गंभीर से गंभीर मरीज को भी मौत के मुंह से खींच लाने वाले मेधावान डॉक्टरों की भारत में कोई कमी नहीं है।
और ऐसी ही एक डॉक्टर हैं बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी के कॉर्डियों थोरेसिक सर्जरी डिपार्टमेंट के एचओडी प्रोफेसर डॉ सिद्धार्थ लाखोटिया।
जिन्होंने एक ऐसे मरीज को नया जीवन दिया है जिसकी हालत देखकर किसी के भी रोंगटे खडे हो सकते हैं।

दरअसल जौनपुर पुलिस वाराणसी के बीएचयू स्थित ट्रामा सेंटर में गंभीर रूप से एक घायल ड्राइवर को लेकर पहुंची तो अस्पताल में सबके दिल कांप उठे।
पुलिस ने बताया कि मछलीशहर इलाके में एक राजनीतिक दल का चुनाव प्रचार करने आये भोपाल निवासी पिकअप ड्राइवर की ट्रक से आमने-सामने की भिडंत हो गयी।
जिसके बाद लगभग दो फीट लंबा और ढाई इंच मोटा लोहे का सरिया चालक के सीने के आर-पार हो गया।
इसके बाद पुलिस उक्त ड्राइवर को लेकर भागी भागी वाराणसी के ट्रॉमा सेंटर पहुंची।
मरीज का ऑपरेशन करने वाली टीम को लीड करने वाले प्रोफेसर डॉ सिद्धार्थ लाखोटिया ने बताया कि लोहे का सरिया चालक के दाएं छाती को चीरता हुआ छाती के पीछे से गर्दन के नीचे वाले हिस्से से बाहर निकल गया था।
इसकी वजह से उसके दाएं फेफड़े में गंभीर चोट आई थी तथा दाएं छाती में हवा भर गई थी एवं काफी खून बह चुका हुआ था।
साथ ही साथ उसके मस्तिष्क में भी गहरी चोट आई थी और दाएं चेहरे दाई आंख एवं दाएं पांव में भी चोटें लगी थी।

डॉ लाखोटिया ने बताया कि मरीज को हमारे पास बेहोशी की हालत में लाया गया था।
इसकी स्थिति को देखते हुए इसका बच पाना काफी मुश्किल लग रहा था।
ऐसी गंभीर स्थिति में ऑपरेशन करके रॉड को निकालना था।
इसके लिये हम सभी ने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की और फटाफट अपनी जिम्मेदारी निभाने में जुट गये।

मरीज चूंकि भोपाल से यहां चुनाव प्रचार में गाडी लेकर आया था इसलिये उसके साथ कोई भी साथी नहीं था।
ऐसी अवस्था में बीएचयू के चिकित्सकों की टीम अस्पताल के कर्मचारी और पुलिस के कर्मचारी ही अब यहां उसके अपने थे।
टीम ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए बिना परिजनों के आने का इंतजार किये मरीज को यथासंभव इलाज की सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई।

एनेस्थीसिया विभाग के विभागाध्यक्ष एवं सर सुंदर लाल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक प्रोफेसर एस के माथुर ने बताया कि ऐसी अवस्था में मरीज को बेहोश करना एक बडी चुनौती एवं सबसे जटिल कार्य होता है।
दुर्घटना इतनी भीषण थी कि लोहे का सरिया मरीज की छाती को भेदने के बाद मुड़ गया था।
जिस कारण इसे बिना काटे मरीज की छाती से बाहर निकालना संभव ही नहीं था।
इसके बाद चिकित्सालय के यांत्रिकी विभाग के कर्मचारियों ने बड़ी कुशलता के साथ लोहे के रॉड के मुड़े हुए हिस्से को काटा।
फिर बडी ही सावधानी के साथ डॉ सिद्धार्थ लखोटिया एवं उनकी टीम ने ऑपरेशन कर इसे बाहर निकाला।
यह ऑपरेशन लगभग 3 घंटे चला। डॉक्टरों के अनुसार मरीज अब चिकित्सालय के सीटीवीएस आईसीयू में स्वास्थ्य लाभ कर रहा है।
कुछ ही दिनों में उसे छुट्टी दे दी जाएगी।

इस तरह की चोट के बाद ज्यादातर लोगों की मृत्यु दुर्घटना स्थल पर ही हो जाती है। मगर कहते हैं न जाको राखे साइयां मार सके न कोई।
साथ ही ये भी कहते हैं कि मारने वाला से हमेशा बचाने वाला ज्यादा बडा होता है। जाहिर है बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी के चिकित्सकों ने एक बार फिर साबित कर दिखाया है कि क्यों डॉक्टरों को धरती का भगवान कहा जाता है।

सिर्फ बीएचयू ट्रॉमा सेंटर में है ये सुविधा
बता दें कि भीषण दुर्घटनाओं से बचाव का सबसे सही तरीका तो ट्रैफिक नियमों का पालन ही है।
मगर दुर्घटना के बाद खासकर छाती में इस तरह की चोट की सर्जरी की सुविधा सिर्फ पूर्वांचल में बीएचयू अस्पताल में ही उपलब्ध है।

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