लालू प्रसाद जी पर जातिवाद का आरोप लगाने वाले 26 फरवरी 1994 को मोराबादी मैदान, राँची में आयोजित तेली महारैली के इस जोरदार भाषण का अंश सुने।

लालू जी इसमें ब्राह्मणवाद की धज्जियाँ उड़ा रहे है। पिछड़ों को न्यायपालिका में, पंचायतों में, सरकारी सेवाओं में आरक्षण को कड़ाई से लागू करने और भ्रमित नहीं होकर उनपर विश्वास बनाए रखने की बात कह रहे है।

शिक्षा पर ज़ोर देते हुए ग़रीबों को पेट काटकर अपने बच्चों को पढ़ाने की गुज़ारिश कर रहे है ताकि वो सामन्तवाद के मकड़जाल को समझ सकें।

जिस समाज को लालू जी ने जागृत किया वही आज एकजुट होकर लालु प्रसाद जी का विरोध कर रहा है। उस दौर में सामाजिक न्याय की अलख जगाने वाले लालू जी उपेक्षित, उत्पीडित और उपहासित वर्गों में सामाजिक और राजनीतिक चेतना जगाने के लिए छोटे-छोटे वर्गों के सम्मेलन करवाते थे और उन समाजों के नेता बनाते थे। नीतीश कुमार लालू जी द्वारा प्रायोजित ऐसी ही कुर्मी चेतना रैली के उत्पाद है।

अगर लालू जी नहीं होते तो आज तेली रघुवर दास झारखंड के मुख्यमंत्री नहीं होते मतलब 1994 में राँची में लालू जी ने जो बीज बोया उसी का परिणाम हुआ कि 20 साल बाद दिल्ली में एक खाँची(तेली) ने प्रधानमंत्री और राँची में ही एक तेली रघुवर दास ने मुख्यमंत्री की शपथ ली।

सोए हुए वंचित वर्गों को जगाने की सज़ा आज लालू जी काट रहे है। और दुर्भाग्य है अब वही जगे हुए और उनकी कोशिशों से पढ़े हुए लोग उन मनुवादियों के दुष्प्रचार से भ्रमित होकर उन्हें भ्रष्टाचारी कह रहे है।

ख़ैर, इतिहास सबके साथ न्याय करता है। सभी महापुरुषों को यातनाएँ झेलनी पड़ती है।

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